
कार्यक्रम का शुभारंभ कुरान-ए-पाक की तिलावत से हुआ। इसके बाद वक्ताओं ने सर सैय्यद अहमद खान की जिंदगी, उनकी तालीमी खिदमात और समाज में शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रयासों पर रोशनी डाली।
प्रोफेसर बैग साहब ने सर सैय्यद की शैक्षिक सेवाओं पर डाली रोशनी
कार्यक्रम के कन्वीनर की जिम्मेदारी निभाते हुए प्रोफेसर बैग साहब ने सर सैय्यद अहमद खान की जीवनशैली पर आधारित अपनी किताब का जिक्र किया। उन्होंने सर सैय्यद की शैक्षिक सेवाओं को विस्तार से बयान करते हुए लोगों से तालीम हासिल करने और आने वाली नस्लों को शिक्षित बनाने की अपील की।
उन्होंने शिक्षा और इबादत के महत्व को बयान करते हुए ये अशआर पेश किए—
सिजदा-ए-इश्क हो तो इबादत में मज़ा आता है,
खाली सिजदों में तो दुनिया ही बसा करती है।
प्रोफेसर बैग साहब ने बताया कि सर सैय्यद अहमद खान का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में हुआ था और 27 मार्च 1898 को अलीगढ़ में उनका इंतकाल हुआ। उन्होंने आधुनिक शिक्षा के प्रसार के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। वर्ष 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (एमएओ) कॉलेज की स्थापना की दिशा में कदम बढ़ाया, जो आगे चलकर वर्ष 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) बना।
इंजीनियर मोहम्मद अली साहब ने किया मेहमानों का इस्तकबाल
इंजीनियर मोहम्मद अली साहब ने कार्यक्रम में आए सभी मेहमानों का इस्तकबाल किया और उन्हें सर सैय्यद डे की मुबारकबाद पेश की। उन्होंने मेहमान-ए-खुसूसी हाजी ज़हीर साहब, जनाब ए. ए. शेख साहब, प्रोफेसर बैग साहब और अल हिदाया फाउंडेशन के कुंवर आसिफ खान का स्वागत किया।
इसके साथ ही उन्होंने मीडिया से जुड़े साथियों—मीडिया प्रभारी हाजी अब्दुल समद, फरहत अली, जनशक्ति क्रांति के संपादक एम. वाई. चौधरी, छठी आंख के संपादक हाजी मास्टर अब्दुल हफीज अंसारी, सलीम साहब (एएमयू), कमर आलम साहब, मसूद अंसारी, प्रधान जी और मेराज साहब सहित कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों का शुक्रिया अदा किया।
तालीम को बताया तरक्की का अहम जरिया
इंजीनियर मोहम्मद अली साहब ने सर सैय्यद अहमद खान के मिशन पर रोशनी डालते हुए शिक्षा को इंसान की जिंदगी संवारने का अहम जरिया बताया। उन्होंने सर सैय्यद से जुड़े एक विचार को पेश करते हुए कहा कि जिस तरह संग-तराश पत्थर को तराशकर उसे खूबसूरत बनाता है, उसी तरह तालीम इंसान की रूह और शख्सियत को निखारती है। उन्होंने लोगों से सर सैय्यद के शैक्षिक मिशन को आगे बढ़ाने की अपील की।
उन्होंने सर सैय्यद अहमद खान के ऐतिहासिक योगदान का जिक्र करते हुए बताया कि मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने वर्ष 1842 में उन्हें ‘जवाद-उद-दौला’ की उपाधि प्रदान की थी। उन्होंने सर सैय्यद की प्रसिद्ध पुस्तकों ‘आसारुस्सनादीद’ (1847), ‘आईने-अकबरी’ और ‘असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द’ का भी जिक्र किया।
वक्ताओं ने सर सैय्यद के मिशन को आगे बढ़ाने पर दिया जोर
कार्यक्रम में ए. ए. शेख साहब और मुख्य अतिथि हाजी ज़हीर साहब ने भी सर सैय्यद अहमद खान की तालीमी खिदमात और उनके विचारों पर अपने ख्यालात का इजहार किया। हाजी अब्दुल समद, राष्ट्रीय सचिव, खुद्दाम-ए-हज कमेटी एवं पूर्व असिस्टेंट हज ऑफिसर ने भी कार्यक्रम की मुबारकबाद पेश की।
कार्यक्रम को कामयाब बनाने में मोहम्मद यूसुफ खान मिंटो और उनके साथियों का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम में बड़ी तादाद में ख्वातीन (मस्तूरात) की मौजूदगी भी आकर्षण का केंद्र रही। सभी की भागीदारी ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
कार्यक्रम के माध्यम से सर सैय्यद अहमद खान के शिक्षा संबंधी विचारों को याद करते हुए समाज में तालीम के प्रसार और आने वाली नस्लों को बेहतर शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराने का संदेश दिया गया।
